सूर्य ग्रहण क्या होता है
जनमानस की भाषा में
आम जनमानस की भाषा में अगर हम सूर्यग्रहण को समझें तो आम जनमानस में यह भ्रांति रहती है। कि सूर्य को राहु ग्रस लेता है और राहु के मुंह में सूर्य के चले जाने से धरती पर अंधेरा हो जाता है यह एक जनमानस में फैली हुई अवधारणा है।
ज्योतिष शास्त्र एवं विज्ञान के आधार पर
ज्योतिष शास्त्र एवं विज्ञान के आधार पर सूर्यग्रहण एक खगोलीय घटना होती है । सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं । चंद्रमा धरती के चारों ओर चक्कर लगाता है ।इसी बीच ऐसी स्थिति बनती है जिस स्थिति में सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाता है । जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा होता है । उस समय सूर्य से आने वाली प्रकाश किरणें पृथ्वी पर नहीं आ पाती। जिसके कारण पृथ्वी पर अंधेरा हो जाता है और पृथ्वी से सूर्य नहीं दिखाई देते और इसी घटना को सूर्यग्रहण के नाम से जाना जाता है ।
यह सूर्य ग्रहण ज्यादातर अमावस्या को होता है और साल में अधिक से अधिक चार से पांच और कम से कम दो बार सूर्यग्रहण होना माना गया है ।
पूर्व सूर्य ग्रहण
पृथ्वी के जो भाग चंद्रमा की कक्षा में पढ़ते हैं वहां पूर्ण ग्रहण होता है । और इसे सर्वग्राही सूर्यग्रहण भी कहते हैं सर्वग्राही सूर्यग्रहण एक स्थान पर कुछ मिनटों का ही होता है
आंशिक सूर्यग्रहण
पृथ्वी तल के जो भाग कक्षा में नहीं पढ़ते हैं उसमें आंशिक ग्रहण दिखाई पड़ता है और सूर्य की जिस भाग में किरण नहीं पहुंच पाती उतना भाग कुछ धुंधला पड़ जाता है ऐसे खंड ग्रहण के समय धूप की तेजी में भी कमी आती है इसे आंशिक ग्रहण कहते हैं यह हम सब जानते हैं कि पृथ्वी से चंद्रमा का आकार बहुत छोटा होता है । चंद्रमा की छाया पृथ्वी के बहुत थोड़े से भाग पर ही पड़ती है सूर्य से आने वाला जो प्रकाश है चंद्रमा की वजह से पृथ्वी के कुछ भाग पर ही नहीं पहुंच पाता जहां सूर्य की किरणें नहीं पहुंच पाएंगे उस स्थान पर सूर्य ग्रहण दिखाई देगा चंद्रमा पृथ्वी से छोटा होने के कारण पूरी पृथ्वी पर सूर्य ग्रहण नहीं होता । जहां पर ज्यादा छाया होती है उसे पूर्ण सूर्यग्रहण और जहां पर कम छाया होती है उसे खंड ग्रहण या आंशिक ग्रहण कहते हैं।
शास्त्रों में राहु केतु की कहानी
देवताओं और दानवों ने मिलकर सागर मंथन प्रारंभ किया और सागर मंथन में बहुमूल्य रत्न मढ़िया निकलने प्रारंभ हो गए। जिसमें वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया और सुमेरु पर्वत को उस बाशुकी नाग की रस्सी से मथा गया। बासूकी नाथ के मुंह बाले भाग को असूरों ने एवं पूछ वाले हिस्से को देवता ने पकड़ सागर को मथना प्रारंभ कर दिया । सागर में से कई बहुमूल्य रत्न और वस्तुएं निकलना प्रारंभ हो गए जिनको उनसे संबंधित देवताओं को वह रत्न और वस्तुएं दिये गए उस सागर मंथन में हलाहल विष निकला उस विष को शिवजी ने अपने कंठ में धारण कर विषपान किया। कई वस्तुएं सागर से निकलती गयी । लक्ष्मी जी और उच्श्रेवा घोड़ा निकला, ऐरावत हाथी निकला और अंत में अमृत कुंभ निकला। अमृत कुंभ निकला तो दानव और देवता दोनों ही अमृत को पीने के लिए अमृत कुंभ की ओर दौड़ पड़े । अम्रत को पान करने के लिए उसकी ओर दौड़ रहे थे तब धनवंतरी भगवान ने अमृत कलश को ले अपने आपको और अम्रित को बचाने के लिए वहां से दूर चले जाने का प्रयास किया और सभी देवता और दानव उनके पीछे-पीछे और धनवंतरी जी उनके आगे आगे भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धर कर सभी देवताओं और दानवों को मोहित कर दिया और उनसे पूछा कि आप लोग क्यों लड़ रहे हो । उन्होंने कहा कि हम अमृत पान करने के लिए आपस में लड़ रहे हैं देवताओं ने कहा कि हम देवता है इसलिए सबसे पहले हम अमृत का पान करेंगे । हम दानव हैं हम बलशाली हैं इसलिए सबसे पहले हम लोग ही अमृत का पान करेंगे । भगवान के मोहिनी रूप से मोहित हुए देवता और दानवों ने मोहिनी से निवेदन किया कि हे मोहिनी अब आप ही हमारा निर्णय करो तब मोहिनी रूप भगवान विष्णु ने दानव और देवताओं को बिठा दिया और कहा कि मैं आप सबको बारी-बारी से अमृतपान कराऊंगी।
एक पंक्ति में दानों को बिठाया और दूसरी पंक्ति में देवताओं को । भगवान विष्णु ने दानवों को पानी पिला दिया । देवतों के पास आए तो अमृत पिलाना शुरू किया । तभी राहु नामक एक असुर देवताओं का भेष बनाकर देवताओं की पंक्ति में आकर बैठ गया और उसने भी अमृत का पान कर लिया जैसे ही उसने अमृत पिया वैसे ही भगवान विष्णु को मालूम चल गया और उन्होंने तुरंत ही अपने सुदर्शन से उसका सिर काट दिया लेकिन जैसे ही सुदर्शन ने उसका सिर काटा उससे पहले अमृत उसके कंठ से होता हुआ उसके उदर में कुछ अम्रत बूंद जा चुकी थी इसलिए वह राहु नामक असुर दो भाग में हो गया राहु और केतु। हम जिन राहु और केतु की बात करते हैं उनका प्रगट इस प्रकार से हुआ है। जनसामान्य की मान्यताओं के द्वारा यह राहु और केतु ही सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का कारण है यही सूर्य और चंद्र को ग्रस लेते। ज्योतिष के आधार पर इन्हें छाया ग्रह माना गया है।
सावधानी
जनमानस की मान्यता के आधार पर सूर्य ग्रहण के समय किसी को भी अपने घर से बाहर नहीं जाना चाहिए खासतौर पर गर्भवती महिलाओं को तो बिल्कुल भी सूर्य ग्रहण में नहीं निकलना चाहिए।
सूर्य ग्रहण के समय सभी मंदिरों को बंद कर दिया जाता है और जब ग्रहण पूर्ण हो जाता है तो उसके द्वारा जो अशुद्धि व्याप्त हो जाती है उसे तुलसी पात्र युक्त जल से सभी स्थानों को शुद्ध करते हैं भोज्य पदार्थों को शुद्ध करते हैं और फिर दोबारा से स्वच्छ भोजन का निर्माण करते हैं । मंदिरों में देवताओं को स्नान कराया जाता है। मंदिरों की धुलाई कर कर शुद्ध किए जाते हैं।
अगर वैज्ञानिक मान्यता देखी जाए तो सूर्य ग्रहण के समय पृथ्वी पर प्रकाश न आने से कई जीवाणु सक्रिय हो जाते हैं ।और वह आसपास अशुद्धि कर देते हैं एवं सूर्य की किरण बीच में चंद्रमा आ जाने से वह नकारात्मक किरणों में तब्दील हो जाती है छाया वाले स्थान पर अधिक अपना प्रभाव रखती है इस कारण उस छाया वाले स्थान जहां पर सूर्य ग्रहण हुआ है उन सभी स्थानों को सूर्य ग्रहण के बाद स्वच्छ किया जाता है ।अगर कोई खाद्य पदार्थ सूर्य ग्रहण में खुला रहा है तो उसे स्वच्छ क्रिया द्वारा शुद्ध किया जाता है।
वास्तव में सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है इसमें किसी प्रकार का कोई डर नहीं है। इस खगोलीय घटना का आनंद लेना चाहिए । साथ में धार्मिक मान्यताओं को मानते हुए अपना बचा भी रखना चाहिए।
।। जय हिन्द।।

















