Tuesday, December 24, 2019

सूर्य ग्रहण कब होता है

सूर्य ग्रहण क्या होता है

जनमानस की भाषा में
आम जनमानस की भाषा में अगर हम सूर्यग्रहण को समझें तो आम जनमानस में यह भ्रांति रहती है। कि सूर्य को राहु ग्रस लेता है और राहु के मुंह में सूर्य के चले जाने से धरती पर अंधेरा हो जाता है यह एक जनमानस में फैली हुई अवधारणा है।

ज्योतिष शास्त्र एवं विज्ञान के आधार पर


ज्योतिष शास्त्र एवं विज्ञान के आधार पर सूर्यग्रहण एक खगोलीय घटना होती है ।  सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं । चंद्रमा धरती के चारों ओर चक्कर लगाता है ।इसी  बीच ऐसी स्थिति बनती है जिस स्थिति में सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाता है । जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा होता है । उस समय सूर्य से आने वाली प्रकाश किरणें पृथ्वी पर नहीं आ पाती। जिसके कारण पृथ्वी पर अंधेरा हो जाता है और पृथ्वी से सूर्य नहीं दिखाई देते और इसी घटना को सूर्यग्रहण के नाम से जाना जाता है ।

 यह सूर्य ग्रहण ज्यादातर अमावस्या को होता है और साल में अधिक से अधिक चार से पांच और कम से कम दो बार सूर्यग्रहण होना माना गया है । 

पूर्व सूर्य ग्रहण
पृथ्वी के जो भाग चंद्रमा की कक्षा में पढ़ते हैं वहां पूर्ण ग्रहण होता है । और इसे सर्वग्राही सूर्यग्रहण भी कहते हैं सर्वग्राही सूर्यग्रहण एक स्थान पर कुछ मिनटों का ही होता है  

आंशिक सूर्यग्रहण
पृथ्वी तल के जो भाग कक्षा में नहीं पढ़ते हैं उसमें आंशिक ग्रहण दिखाई पड़ता है और सूर्य की जिस भाग में किरण नहीं पहुंच पाती उतना भाग कुछ धुंधला पड़ जाता है ऐसे खंड ग्रहण के समय धूप की तेजी में भी कमी आती है इसे आंशिक ग्रहण कहते हैं यह हम सब जानते हैं  कि पृथ्वी से चंद्रमा का आकार बहुत छोटा होता है । चंद्रमा की छाया पृथ्वी के बहुत थोड़े से भाग पर ही पड़ती है सूर्य से आने वाला जो प्रकाश है चंद्रमा की वजह से पृथ्वी के कुछ भाग पर ही नहीं पहुंच पाता जहां सूर्य की किरणें नहीं पहुंच पाएंगे उस स्थान पर सूर्य ग्रहण दिखाई देगा चंद्रमा पृथ्वी से छोटा होने के कारण पूरी पृथ्वी पर सूर्य ग्रहण नहीं होता । जहां पर ज्यादा छाया होती है उसे पूर्ण सूर्यग्रहण और जहां पर कम छाया होती है उसे खंड ग्रहण या आंशिक ग्रहण कहते हैं।



शास्त्रों में राहु केतु की कहानी

देवताओं और दानवों ने मिलकर सागर मंथन प्रारंभ किया और सागर मंथन में बहुमूल्य रत्न मढ़िया निकलने प्रारंभ हो गए। जिसमें वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया और सुमेरु पर्वत को उस बाशुकी नाग की रस्सी से मथा गया। बासूकी नाथ के मुंह बाले भाग को असूरों ने एवं पूछ वाले हिस्से को देवता ने पकड़ सागर को मथना प्रारंभ कर दिया । सागर में से कई बहुमूल्य रत्न और वस्तुएं निकलना प्रारंभ हो गए जिनको उनसे  संबंधित देवताओं को वह रत्न और वस्तुएं दिये गए उस सागर मंथन में हलाहल विष निकला उस विष को शिवजी ने अपने कंठ में धारण कर विषपान किया। कई वस्तुएं सागर से निकलती गयी । लक्ष्मी जी  और उच्श्रेवा घोड़ा निकला, ऐरावत हाथी निकला और अंत में अमृत कुंभ निकला। अमृत कुंभ निकला तो दानव और देवता दोनों ही अमृत को पीने के लिए अमृत कुंभ की ओर दौड़ पड़े । अम्रत  को पान करने के लिए उसकी ओर दौड़ रहे थे तब धनवंतरी भगवान ने अमृत कलश को ले अपने आपको और अम्रित को बचाने के लिए वहां से दूर चले जाने का प्रयास किया और सभी देवता और दानव उनके पीछे-पीछे और धनवंतरी जी उनके आगे आगे भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धर  कर सभी देवताओं और दानवों को मोहित कर दिया और उनसे पूछा कि आप लोग क्यों लड़ रहे हो । उन्होंने कहा कि हम अमृत पान करने के लिए आपस में लड़ रहे हैं देवताओं ने कहा कि हम देवता है इसलिए सबसे पहले हम अमृत का पान करेंगे ।  हम दानव हैं हम बलशाली हैं इसलिए सबसे पहले हम लोग ही अमृत का पान करेंगे । भगवान के मोहिनी रूप से मोहित हुए देवता और दानवों ने  मोहिनी से निवेदन किया कि हे मोहिनी अब आप ही हमारा निर्णय करो तब मोहिनी रूप भगवान विष्णु ने दानव और देवताओं को बिठा दिया और कहा कि मैं आप सबको बारी-बारी से अमृतपान कराऊंगी।
 एक पंक्ति में दानों को बिठाया और दूसरी पंक्ति में देवताओं को । भगवान विष्णु ने दानवों को पानी पिला दिया ।  देवतों के पास आए तो अमृत पिलाना शुरू किया । तभी राहु नामक एक असुर देवताओं का भेष बनाकर देवताओं की पंक्ति में आकर बैठ गया और उसने भी अमृत का पान कर लिया जैसे ही उसने अमृत पिया वैसे ही भगवान विष्णु को मालूम चल गया  और उन्होंने तुरंत ही अपने सुदर्शन से उसका सिर काट दिया लेकिन जैसे ही सुदर्शन ने उसका सिर काटा उससे पहले अमृत उसके कंठ से होता हुआ उसके उदर में कुछ अम्रत बूंद जा चुकी थी इसलिए वह राहु नामक असुर दो भाग में हो गया राहु और केतु। हम जिन   राहु और केतु की बात करते हैं उनका प्रगट इस प्रकार से हुआ है। जनसामान्य की मान्यताओं के द्वारा यह राहु और केतु ही सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का कारण है यही सूर्य और चंद्र को ग्रस लेते। ज्योतिष के आधार पर इन्हें छाया ग्रह माना गया है।

सावधानी

जनमानस की मान्यता के आधार पर सूर्य ग्रहण के समय किसी को भी अपने घर से बाहर नहीं जाना चाहिए खासतौर पर गर्भवती महिलाओं को तो बिल्कुल भी सूर्य ग्रहण में नहीं निकलना चाहिए।
सूर्य ग्रहण के समय सभी मंदिरों को बंद कर दिया जाता है और जब ग्रहण पूर्ण हो जाता है तो उसके  द्वारा जो अशुद्धि व्याप्त हो जाती है उसे तुलसी पात्र युक्त जल से सभी स्थानों को शुद्ध करते हैं भोज्य पदार्थों को शुद्ध करते हैं और फिर दोबारा से स्वच्छ भोजन का निर्माण करते हैं । मंदिरों में देवताओं को स्नान कराया जाता है। मंदिरों की धुलाई कर कर शुद्ध किए जाते हैं।

अगर वैज्ञानिक मान्यता देखी जाए तो सूर्य ग्रहण के समय पृथ्वी पर प्रकाश न आने से कई जीवाणु सक्रिय हो जाते हैं ।और वह आसपास अशुद्धि कर देते हैं एवं सूर्य की किरण बीच में चंद्रमा आ जाने से वह नकारात्मक किरणों में तब्दील हो जाती है  छाया वाले स्थान पर अधिक अपना प्रभाव रखती है इस कारण उस छाया वाले स्थान जहां पर सूर्य ग्रहण हुआ है उन सभी स्थानों को सूर्य ग्रहण के बाद स्वच्छ किया जाता है ।अगर कोई खाद्य पदार्थ सूर्य ग्रहण में खुला रहा है तो उसे स्वच्छ क्रिया द्वारा शुद्ध किया जाता है।

वास्तव में सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है इसमें किसी प्रकार का कोई डर नहीं है। इस खगोलीय घटना का आनंद लेना चाहिए । साथ में धार्मिक मान्यताओं को मानते हुए अपना बचा भी रखना चाहिए।

।। जय हिन्द।।

Friday, December 20, 2019

शिखा या चोटी का क्या महत्त्व है, क्यों रखना चाहिए।



जनसाधारण की मान्यता
हमारे आसपास जनसाधारण में यह बात प्रचलित रहती है कि शिखा बांधना या चोटी बांधना या रखना। यह ब्राह्मण और कर्मकांडी व्यक्तियों का काम होता है जो कि एक धार्मिक प्रतीक भी है हिंदू होने का।

शिखा रखने का वैज्ञानिक आधार

हमारे ऋषि-मुनियों में सनातन धर्म के अंदर कोई व्यवस्था बनाई है वह एक बहुत ही वैज्ञानिक आधार पर बनाई गई है जैसे सिखा रखना यह सिर्फ एक हिंदू रीति रिवाज नहीं है शिखा रखने का एक वैज्ञानिक आधार है शिखा स्थल पर ब्रह्मरंध्र या दशम द्वार होता है जहां पर सहस्त्रार चक्र रहता है इसी स्थान पर सुषम्ना नामक नाड़ी भी रहती है एवं शरीर की सभी नाडियों का यहां पर आकर मिलना भी होता है इस आधार पर यह स्थान पूरे शरीर का अधिपत्य स्थान माना गया है और यह स्थान बहुत ही संवेदनशील भी माना गया है इस स्थान पर अगर चोट लग जाए तो व्यक्ति की तत्काल मृत्यु भी हो सकती है इस आधार पर इस स्थान पर चोटी रखने की हमारे पूर्वजों ने व्यवस्था की। हमारे मस्तिष्क का सबसे ऊपरी का भाग जोकि ब्रह्मरंध्र स्थान है इसकी सुरक्षा के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने शिखा रखने का चलन चलाया शिखा रखने से यहां बालों की संख्या अधिक होने से इस स्थान की रक्षा हो सके ।चोट लगने पर भी व्यक्ति को प्राण गंवाने न पड़े इसलिए यहां पर शिखा की व्यवस्था की गई ।

यह स्थान ऊर्जा को अपने अंदर लेने और ऊर्जा को निकालने दोनों का ही यह केन्द्र भी माना जाता है इसीलिए कर्मकांड के समय चोटी में गांठ बांधना उसी विद्युत प्रभाव को रोकने की प्रक्रिया के आधार पर किया जाता है हमारी शिखा आध्यात्मिक ऊष्मा को शोषित करती है अवशोषित करती है और ब्रह्मांड की शक्तियों से हमारे मस्तिष्क को जोड़ती है जो व्यक्ति सहस्रार चक्र को जागृत करने के प्रयास में लगे रहते हैं सहस्रार चक्र तभी जागृत हो सकता है जब वह गोखुर के आकार की या सहस्रार चक्र के आकार की शिखा अपने मस्तक पर धारण करेंगे।  एक लौकिक मंत्र शिखा के बारे में प्रचलित है

स्नाने दाने, जपे होने संध्यायां देवतार्चने।
 शिखाग्रंथिं बिना कर्म न कुर्याद बे कदाचन।।
 स्नान दान जप संध्या और देवताओं की पूजा के समय शिखा को बांधना चाहिए नहीं तो सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं ।

शिखा बांधने के लिए भी हमारे शास्त्रों में द्वारा एक मंत्र दिया गया है।  शिखा बांधते समय इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है।

 चिद्रूपिणी महामाये दिव्यतेज: समन्विते।
तिष्ठ देवी शिखा मध्ये तेजो व्रद्धिं कुरूष्व में।।
जो चित्त स्वरूप महामाया है जो दिव्य तेजोमयी हैं ।वे महामाया मेरी शिखा के मध्य स्थित होकर मेरे तेज की वृद्धि करें।


 धर्म अनुष्ठान में उपार्जित आध्यात्मिक शक्ति का विनाश ना हो । शिखा रखें एवं शिखा में गांठ लगाएं।

शिखा प्रेत बाधा दूर करने में भी बहुत कारगर है विद्वानों के मतानुसार जिस व्यक्ति को प्रेत परेशान करते हैं शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और ज्ञानियों के पास जाने पर शरीर छोड़कर भाग जाते हैं उस स्थिति में जैसे ही प्रेत प्राणी के मनुष्य के शरीर में प्रवेश करें उसी समय उसकी चोटी में गांठ लगा देने से प्रेत भाग नहीं पाता और वह ओझा या जानिया के पास जाने पर  ओझा, जानिया उसे मंत्र द्वारा अपने बस में कर हमेशा के लिए व्यक्ति को स्प्रेत से छुड़वा देते हैं।

शिखा रखने के लिए भी किसी प्रकार की कोई बाध्यता नहीं है कोई भी व्यक्ति शिखा धारण कर सकता है बस शिखा को गोखुर के आकार में ही धारण करें। तभी शिखा का पूरा लाभ मिल सकेगा।

जय हिन्द जय मां भारती

Thursday, November 28, 2019

दिन में सोना अच्छा होता है या बुरा


दिन में सोना अच्छा होता है या बुरा इस विषय पर प्रकाश डालेंगे।




बुजुर्गों की मान्यता के अनुसार दिन में सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। साथ ही समय-समय पर इस विषय पर कई रिसर्च होते रहते हैं। हाल ही में हुए यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया के एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने दोपहर में नींद की झपकी लेने को सेहत के लिए फायदेमंद बताया है ।दोपहर में खाना खाने के बाद जब उस शरीर मैं नींद के रसायन बढ़ने लगे हैं उस समय अगर थोड़ी सी झपकी ले ली जाए तो उससे शरीर में दोबारा से फूरती आ जाती है और वह काम करने के लिए तैयार हो जाता है। शरीर में नींद का रसायन बड़ा हो और अगर हम काम में लगे रहे तो वह काम ठीक से नहीं हो पाता वह काम जरूर बिगड़ जाता है इसलिए अगर निंद आए तो हल्की सी झपकी जरूर ले ले वैसे दिन में सोना काम और सेहत दोनों के लिए ही हानिकारक होता है ।

।।जय हिन्द।।


Wednesday, November 27, 2019

ईश्वर कौन है।

ईश्वर कौन है।


मेरी मन की जिज्ञासा जोकि ईश्वर को जानने की बहुत दिनों से हो रही थी ।इसी की खोज में मैंने कुछ धार्मिक ग्रंथों से कुछ स्लोकों का अध्ययन किया जो इस तरह से हैं।

ऊं यो भूतों च भव्य च सर्व यसश्चाधितिष्ठति।
स्वर्यस्य च केवलं तस्मै जिष्ठाय ब्रह्मणे नमः ।।
                                       (अथर्ववेद 10-8-1)
भावार्थ :- जो भूत भविष्य और सब में व्यापक है ।जो दिव्य लोकौं का भी अधिष्ठाता है। उस ब्रह्म (परमेश्वर) को प्रणाम है।

ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होई नर जाहि न जानत वेद।।

तप बल रचाई प्रपंचु विधाता। तपबल विष्णु सकल जगत्राता त।।
तपबल संभु करहिं संघारा । तपबल सेषु धरहिं महिभारा।।

हरि व्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रगट हुहिं मैं जाना।।

इस प्रकार हमारे धर्म ग्रंथों में ईश्वर के महत्व व ईश्वर के बारे में वर्णन मिलता है

सगोत्र विवाह क्यों निषेध

एक ही गोत्र में विवाह क्यों नहीं हो सकता
सनातन धर्म में पिता के नाम से ही उसके वंशज जाने जाते हैं और कालांतर में वे सभी एक गोत्र के रूप में वर्णित हो जाते हैं वे सभी रक्त संबंधी होते हैं सभी के अंदर एक ही कुल पुरुष का रक्त होता है इसलिए सभी एक ही गोत्र के भाई और बहन कहलाती हैं ।प्रारंभ से ही हिंदू समाज में सगोत्र विवाह निषेध माना गया है ।धार्मिक कारण तो है ही लेकिन इसका एक वैज्ञानिक पक्ष भी है कि दूध में दूध मिलाने से कोई अंतर नहीं पड़ता लेकिन दूध में थोड़ा सा भी नींबू पड़ जाए तो वह दूध दही में परिणित करके बहुसंख्यक मक्खन कणों में एकत्रित संगठित हो जाता है।
और विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है कि एक ही गोत्र में उत्पन्न पुरुष और स्त्री की संताने होती है वह अप्राकृतिक रूप में जन्म लेती है और उन्हें जन्म से ही कई प्रकार की बीमारियां घेर लेती है और बीमारी से ग्रसित रहते हैं। सही जातक का जन्म तभी होता है जब दो अलग-अलग गोत्र के स्त्री पुरुष हो।


सूर्य को अर्ध्य क्यों देते हैं

सूर्य को अर्ध्य क्यों देते हैं।



अगर हम साधारण जनमानस के बीच में जो भावना व्याप्त है वह सूर्य अर्ध्य को एक धार्मिक कृत्य से जोड़ती है जो कि हर हिंदू रीति रिवाज मानने वाले के लिए कर्म है उसे करना चाहिए। इससे पापों का नाश होता है। सूर्य देव प्रसन्न होते हैं ।और जो बिना सूर्य अर्ध्य भोजन करता है वह भी पाप है। एक श्लोक प्रचलित है।
अथ संध्याया यदप: प्रयुक्ते ता विप्रुषो बज्रीयुत्वा असुरान पाध्नन्ति। 
षड्विंश 4/5
जिसका अर्थ है संध्या में जो जल का प्रयोग किया जाता है वह जल के कण बज्र बनकर असुरों का नाश करती हैं।
सूर्य को प्रातः अर्ध्य देते समय साधक जल को अंजलि में लेकर सूर्य की ओर मुंह कर खड़ा होकर जब जल को भूमि पर गिर आता है तो नवोदित सूर्य की सीधी पढ़ती हुई किरणों से  वह जल  मस्तक से लेकर पांव तक साधक के शरीर में घातक महामारी नाशक किरणें प्रवाह कर देती है सू।किरणें जब जल में से गुजरती हैं तो वह किरणें कई प्रकार की बीमारियों को पैदा करने वाले कीटाणु घातक कीटाणुओं का नाश कर देती हैं जिससे कई प्रकार की बीमारियां उत्पन्न होती है वह बीमारियां समाप्त हो जाती हैं इस प्रकार सूर्य को अर्ध देना धार्मिक कार्य के साथ-साथ यह एक वैज्ञानिक कर्म है जिसको हमारे ऋषि-मुनियों ने धार्मिक रीति बनाकर जनमानस में प्रचलित किया।

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