Thursday, November 28, 2019

दिन में सोना अच्छा होता है या बुरा


दिन में सोना अच्छा होता है या बुरा इस विषय पर प्रकाश डालेंगे।




बुजुर्गों की मान्यता के अनुसार दिन में सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। साथ ही समय-समय पर इस विषय पर कई रिसर्च होते रहते हैं। हाल ही में हुए यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया के एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने दोपहर में नींद की झपकी लेने को सेहत के लिए फायदेमंद बताया है ।दोपहर में खाना खाने के बाद जब उस शरीर मैं नींद के रसायन बढ़ने लगे हैं उस समय अगर थोड़ी सी झपकी ले ली जाए तो उससे शरीर में दोबारा से फूरती आ जाती है और वह काम करने के लिए तैयार हो जाता है। शरीर में नींद का रसायन बड़ा हो और अगर हम काम में लगे रहे तो वह काम ठीक से नहीं हो पाता वह काम जरूर बिगड़ जाता है इसलिए अगर निंद आए तो हल्की सी झपकी जरूर ले ले वैसे दिन में सोना काम और सेहत दोनों के लिए ही हानिकारक होता है ।

।।जय हिन्द।।


Wednesday, November 27, 2019

ईश्वर कौन है।

ईश्वर कौन है।


मेरी मन की जिज्ञासा जोकि ईश्वर को जानने की बहुत दिनों से हो रही थी ।इसी की खोज में मैंने कुछ धार्मिक ग्रंथों से कुछ स्लोकों का अध्ययन किया जो इस तरह से हैं।

ऊं यो भूतों च भव्य च सर्व यसश्चाधितिष्ठति।
स्वर्यस्य च केवलं तस्मै जिष्ठाय ब्रह्मणे नमः ।।
                                       (अथर्ववेद 10-8-1)
भावार्थ :- जो भूत भविष्य और सब में व्यापक है ।जो दिव्य लोकौं का भी अधिष्ठाता है। उस ब्रह्म (परमेश्वर) को प्रणाम है।

ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होई नर जाहि न जानत वेद।।

तप बल रचाई प्रपंचु विधाता। तपबल विष्णु सकल जगत्राता त।।
तपबल संभु करहिं संघारा । तपबल सेषु धरहिं महिभारा।।

हरि व्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रगट हुहिं मैं जाना।।

इस प्रकार हमारे धर्म ग्रंथों में ईश्वर के महत्व व ईश्वर के बारे में वर्णन मिलता है

सगोत्र विवाह क्यों निषेध

एक ही गोत्र में विवाह क्यों नहीं हो सकता
सनातन धर्म में पिता के नाम से ही उसके वंशज जाने जाते हैं और कालांतर में वे सभी एक गोत्र के रूप में वर्णित हो जाते हैं वे सभी रक्त संबंधी होते हैं सभी के अंदर एक ही कुल पुरुष का रक्त होता है इसलिए सभी एक ही गोत्र के भाई और बहन कहलाती हैं ।प्रारंभ से ही हिंदू समाज में सगोत्र विवाह निषेध माना गया है ।धार्मिक कारण तो है ही लेकिन इसका एक वैज्ञानिक पक्ष भी है कि दूध में दूध मिलाने से कोई अंतर नहीं पड़ता लेकिन दूध में थोड़ा सा भी नींबू पड़ जाए तो वह दूध दही में परिणित करके बहुसंख्यक मक्खन कणों में एकत्रित संगठित हो जाता है।
और विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है कि एक ही गोत्र में उत्पन्न पुरुष और स्त्री की संताने होती है वह अप्राकृतिक रूप में जन्म लेती है और उन्हें जन्म से ही कई प्रकार की बीमारियां घेर लेती है और बीमारी से ग्रसित रहते हैं। सही जातक का जन्म तभी होता है जब दो अलग-अलग गोत्र के स्त्री पुरुष हो।


सूर्य को अर्ध्य क्यों देते हैं

सूर्य को अर्ध्य क्यों देते हैं।



अगर हम साधारण जनमानस के बीच में जो भावना व्याप्त है वह सूर्य अर्ध्य को एक धार्मिक कृत्य से जोड़ती है जो कि हर हिंदू रीति रिवाज मानने वाले के लिए कर्म है उसे करना चाहिए। इससे पापों का नाश होता है। सूर्य देव प्रसन्न होते हैं ।और जो बिना सूर्य अर्ध्य भोजन करता है वह भी पाप है। एक श्लोक प्रचलित है।
अथ संध्याया यदप: प्रयुक्ते ता विप्रुषो बज्रीयुत्वा असुरान पाध्नन्ति। 
षड्विंश 4/5
जिसका अर्थ है संध्या में जो जल का प्रयोग किया जाता है वह जल के कण बज्र बनकर असुरों का नाश करती हैं।
सूर्य को प्रातः अर्ध्य देते समय साधक जल को अंजलि में लेकर सूर्य की ओर मुंह कर खड़ा होकर जब जल को भूमि पर गिर आता है तो नवोदित सूर्य की सीधी पढ़ती हुई किरणों से  वह जल  मस्तक से लेकर पांव तक साधक के शरीर में घातक महामारी नाशक किरणें प्रवाह कर देती है सू।किरणें जब जल में से गुजरती हैं तो वह किरणें कई प्रकार की बीमारियों को पैदा करने वाले कीटाणु घातक कीटाणुओं का नाश कर देती हैं जिससे कई प्रकार की बीमारियां उत्पन्न होती है वह बीमारियां समाप्त हो जाती हैं इस प्रकार सूर्य को अर्ध देना धार्मिक कार्य के साथ-साथ यह एक वैज्ञानिक कर्म है जिसको हमारे ऋषि-मुनियों ने धार्मिक रीति बनाकर जनमानस में प्रचलित किया।

ऊं