सूर्य को अर्ध्य क्यों देते हैं।
अगर हम साधारण जनमानस के बीच में जो भावना व्याप्त है वह सूर्य अर्ध्य को एक धार्मिक कृत्य से जोड़ती है जो कि हर हिंदू रीति रिवाज मानने वाले के लिए कर्म है उसे करना चाहिए। इससे पापों का नाश होता है। सूर्य देव प्रसन्न होते हैं ।और जो बिना सूर्य अर्ध्य भोजन करता है वह भी पाप है। एक श्लोक प्रचलित है।
अथ संध्याया यदप: प्रयुक्ते ता विप्रुषो बज्रीयुत्वा असुरान पाध्नन्ति।
षड्विंश 4/5
जिसका अर्थ है संध्या में जो जल का प्रयोग किया जाता है वह जल के कण बज्र बनकर असुरों का नाश करती हैं।
सूर्य को प्रातः अर्ध्य देते समय साधक जल को अंजलि में लेकर सूर्य की ओर मुंह कर खड़ा होकर जब जल को भूमि पर गिर आता है तो नवोदित सूर्य की सीधी पढ़ती हुई किरणों से वह जल मस्तक से लेकर पांव तक साधक के शरीर में घातक महामारी नाशक किरणें प्रवाह कर देती है सू।किरणें जब जल में से गुजरती हैं तो वह किरणें कई प्रकार की बीमारियों को पैदा करने वाले कीटाणु घातक कीटाणुओं का नाश कर देती हैं जिससे कई प्रकार की बीमारियां उत्पन्न होती है वह बीमारियां समाप्त हो जाती हैं इस प्रकार सूर्य को अर्ध देना धार्मिक कार्य के साथ-साथ यह एक वैज्ञानिक कर्म है जिसको हमारे ऋषि-मुनियों ने धार्मिक रीति बनाकर जनमानस में प्रचलित किया।
ऊं


ऊं सुर्याय नमः
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