Friday, December 20, 2019

शिखा या चोटी का क्या महत्त्व है, क्यों रखना चाहिए।



जनसाधारण की मान्यता
हमारे आसपास जनसाधारण में यह बात प्रचलित रहती है कि शिखा बांधना या चोटी बांधना या रखना। यह ब्राह्मण और कर्मकांडी व्यक्तियों का काम होता है जो कि एक धार्मिक प्रतीक भी है हिंदू होने का।

शिखा रखने का वैज्ञानिक आधार

हमारे ऋषि-मुनियों में सनातन धर्म के अंदर कोई व्यवस्था बनाई है वह एक बहुत ही वैज्ञानिक आधार पर बनाई गई है जैसे सिखा रखना यह सिर्फ एक हिंदू रीति रिवाज नहीं है शिखा रखने का एक वैज्ञानिक आधार है शिखा स्थल पर ब्रह्मरंध्र या दशम द्वार होता है जहां पर सहस्त्रार चक्र रहता है इसी स्थान पर सुषम्ना नामक नाड़ी भी रहती है एवं शरीर की सभी नाडियों का यहां पर आकर मिलना भी होता है इस आधार पर यह स्थान पूरे शरीर का अधिपत्य स्थान माना गया है और यह स्थान बहुत ही संवेदनशील भी माना गया है इस स्थान पर अगर चोट लग जाए तो व्यक्ति की तत्काल मृत्यु भी हो सकती है इस आधार पर इस स्थान पर चोटी रखने की हमारे पूर्वजों ने व्यवस्था की। हमारे मस्तिष्क का सबसे ऊपरी का भाग जोकि ब्रह्मरंध्र स्थान है इसकी सुरक्षा के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने शिखा रखने का चलन चलाया शिखा रखने से यहां बालों की संख्या अधिक होने से इस स्थान की रक्षा हो सके ।चोट लगने पर भी व्यक्ति को प्राण गंवाने न पड़े इसलिए यहां पर शिखा की व्यवस्था की गई ।

यह स्थान ऊर्जा को अपने अंदर लेने और ऊर्जा को निकालने दोनों का ही यह केन्द्र भी माना जाता है इसीलिए कर्मकांड के समय चोटी में गांठ बांधना उसी विद्युत प्रभाव को रोकने की प्रक्रिया के आधार पर किया जाता है हमारी शिखा आध्यात्मिक ऊष्मा को शोषित करती है अवशोषित करती है और ब्रह्मांड की शक्तियों से हमारे मस्तिष्क को जोड़ती है जो व्यक्ति सहस्रार चक्र को जागृत करने के प्रयास में लगे रहते हैं सहस्रार चक्र तभी जागृत हो सकता है जब वह गोखुर के आकार की या सहस्रार चक्र के आकार की शिखा अपने मस्तक पर धारण करेंगे।  एक लौकिक मंत्र शिखा के बारे में प्रचलित है

स्नाने दाने, जपे होने संध्यायां देवतार्चने।
 शिखाग्रंथिं बिना कर्म न कुर्याद बे कदाचन।।
 स्नान दान जप संध्या और देवताओं की पूजा के समय शिखा को बांधना चाहिए नहीं तो सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं ।

शिखा बांधने के लिए भी हमारे शास्त्रों में द्वारा एक मंत्र दिया गया है।  शिखा बांधते समय इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है।

 चिद्रूपिणी महामाये दिव्यतेज: समन्विते।
तिष्ठ देवी शिखा मध्ये तेजो व्रद्धिं कुरूष्व में।।
जो चित्त स्वरूप महामाया है जो दिव्य तेजोमयी हैं ।वे महामाया मेरी शिखा के मध्य स्थित होकर मेरे तेज की वृद्धि करें।


 धर्म अनुष्ठान में उपार्जित आध्यात्मिक शक्ति का विनाश ना हो । शिखा रखें एवं शिखा में गांठ लगाएं।

शिखा प्रेत बाधा दूर करने में भी बहुत कारगर है विद्वानों के मतानुसार जिस व्यक्ति को प्रेत परेशान करते हैं शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और ज्ञानियों के पास जाने पर शरीर छोड़कर भाग जाते हैं उस स्थिति में जैसे ही प्रेत प्राणी के मनुष्य के शरीर में प्रवेश करें उसी समय उसकी चोटी में गांठ लगा देने से प्रेत भाग नहीं पाता और वह ओझा या जानिया के पास जाने पर  ओझा, जानिया उसे मंत्र द्वारा अपने बस में कर हमेशा के लिए व्यक्ति को स्प्रेत से छुड़वा देते हैं।

शिखा रखने के लिए भी किसी प्रकार की कोई बाध्यता नहीं है कोई भी व्यक्ति शिखा धारण कर सकता है बस शिखा को गोखुर के आकार में ही धारण करें। तभी शिखा का पूरा लाभ मिल सकेगा।

जय हिन्द जय मां भारती

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